8 हिंदी वसंत

बस की यात्रा

सारांश

यह कहानी हरशंकर परसाई ने लिखी है। इस कहानी में एक खस्ताहाल बस से सफर के अनुभवों के बारे में लिखा गया है।

ऐसी बस भारत के किसी भी हिस्से में दिखाई पड़ सकती है, खासकर दूर दराज के गाँवों में जाने वाली सड़कों पर, ऐसी सड़कों पर जो किसी मुख्य राजमार्ग का हिस्सा न हों।

बस बहुत पुरानी हो चुकी है और नियमित रखरखाव के अभाव में पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। बस को देखकर किसी को यकीन नहीं हो सकता है कि वह चल भी पाती है। बस में सवारी करने में यह डर भी सताता है कि बस बीच रास्ते में ही खराब हो गई तो फिर पूरी रात बियाबान में काटनी पड़ेगी। उससे भी बुरा तब हो सकता है जब बस का ब्रेक या स्टीयरिंग फेल हो जाने से कोई दुर्घटना हो जाए। ऐसे में कई लोगों की जानें जा सकती हैं।

बस बमुश्किल कुछ दूर चलती है फिर रो गाकर खड़ी हो जाती है। फिर कुछ जुगाड़ लगाने से बस चलने लगती है। धीरे धीरे बस की हालत से सभी यात्री समझौता कर लेते हैं और उस कष्टकारी यात्रा में भी हास्य व्यंग्य का रास्ता ढ़ूँढ़ लेते हैं।

NCERT Solution

कहानी से

प्रश्न 1: लेखक के मन में हिस्सेदार सहब के लिए श्रद्धा क्यों जग गयी?

उत्तर: बस के हिस्सेदार को बस की बुरी हालत के बारे में अच्छी तरह से मालूम था। उसे ये पता था कि बस कहीं भी धोखा दे सकती थी। खासकर यदि ब्रेक ने धोखा दे दिया तो जान जाने का भी डर था। फिर भी वह हिस्सेदार अपनी बस में जाने की हिम्मत कर रहा था। इसलिए लेखक के मन में हिस्सेदार के लिए श्रद्धा जग गयी।

प्रश्न 2: लोगों ने ऐसी सलाह क्यों दी कि समझदार आदमी उस शाम वाली बस से सफर नहीं करते?

उत्तर: शाम हो या सुबह कोई भी आदमी खस्ताहाल बस मे तब तक सफर नहीं करेगा जब तक कोई बहुत आपात की स्थिति न हो, या उस रास्ते पर जाने के लिए कोई अन्य साधन नहीं हो। इसलिए लोगों ने उस शाम वाली बस में जाने से मना कर दिया था।

प्रश्न 3: लोगों को ऐसा क्यों लगा जैसे सारी बस इंजन हो और वे लोग उस इंजन में बैठे हुए हों?

उत्तर: बस के सारे पेंच ढ़ीले हो गए थे। इसलिये इंजन चलने से पूरी ही बस इंजन की तरह शोर मचा रही थी और काँप भी रही थी। शोर शराबे और बुरी तरह हिलने डुलने से ऐसा लग रहा था कि वे लोग बस में नहीं बल्कि इंजन में ही बैठे हों।

प्रश्न 4: लेखक को बस के अपने आप चलने की योग्यता के बारे में जानकर आश्चर्य क्यों हुआ?

उत्तर: अक्सर सुदूर गाँवों के इलाके में पुरानी और जर्जर बसें ही चला करती हैं। उन्हें देखकर किसी बड़े शहर के निवासी को भरोसा ही नहीं होगा कि वे चल भी सकती हैं। इसलिए लेखक को भी ये जानकर अचम्भा हुआ कि बस अपने आप चल पड़ती है और उसे धक्का लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

प्रश्न 5: लेखक पेड़ों को दुश्मन क्यों समझ रहा था?

उत्तर: प्राय: राजमार्गों की यात्रा करते समय लोग अगल बगल की हरियाली को निहारने में मग्न होते हैं। गाँवों की नैसर्गिक सुंदरता देखते ही बनती है। लेकिन बस की दुर्दशा ने लेखक या उसके दोस्तों पर तो भय का प्रभाव छोड़ दिया था। इसलिए लेखक को ऐसा लग रहा था कि कभी भी कोई भी पेड़ आकर उनसे टकरा सकता है। इसलिए पेड़ लेखक को दुश्मन की भांति दिख रहे थे।

पाठ से आगे

प्रश्न 1: ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ किसके नेतृत्व में, किस उद्देश्य से तथा कब हुआ था? इतिहास की उपब्ध पुस्तकों के आधार पर लिखिए।

उत्तर: सविनय अवज्ञा आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व में हुआ था। यह आंदोलन 12 मार्च 1930 को शुरु हुआ था। इस आंदोलन का उद्देश्य था अंग्रेजी सरकार के कायदे कानूनों का उल्लंघन करना वह भी विनय पूर्वक। इसी आंदोलन के दौरान गांधी जी ने दांडी मार्च किया था जिसके अंत में उन्होंने नमक पर टैक्स के कानून का उल्लंघन किया था।

प्रश्न 2: सविनय अवज्ञा का उपयोग व्यंग्यकार ने किस रूप में किया है? लिखिए।

उत्तर: बस के सारे कल पुर्जे एक दूसरे से असहयोग कर रहे थे। जब किसी भी मशीन के कल पुर्जे आपसी तारतम्य से नहीं चलते हैं तो मशीन ठीक से काम नहीं करती है। इसलिए लेखक ने बस में होने वाली हरकतों को सविनय अवज्ञा का नाम दिया है।

प्रश्न 3: आप अपनी किसी यात्रा के खट्टे मीठे अनुभवों को याद करते हुए एक लेख लिखिए।

उत्तर: एक बार मैं पटना से दरभंगा जा रहा था। बरसात का मौसम था और यह खबर आ रही थी कि मिथिला के इलाके में बाढ़ कभी भी आ सकती है। बस के ड्राइवर ने बताया था कि हो सकता है कि मंजिल पर पहुँचने से पहले ही बीच रास्ते में कहीं सड़क कटी हुई मिले और फिर आगे जाना असंभव हो जाए। जाना जरूरी था इसलिए अन्य यात्रियों की तरह मैं भी सवार हो गया। जब दरभंगा से कोई बीसेक किलोमीटर का फासला बचा होगा तो बस रुक गई और सड़क के किनारे खड़ी हो गई। खिड़की से देखने पर पता चला कि वहाँ पर बसों की लंबी कतार लगी हुई थी। सैंकड़ो यात्री सड़क पर चहलकदमी कर रहे थे और स्थिति का जायजा ले रहे थे।

बस के ड्राइवर ने बताया कि आगे बाढ़ के कारण सड़क में कटाव हो चुका था इसलिए बस आगे नहीं जा सकती थी। उसने यह भी बताया कि एक घंटे के आराम के बाद बस वापस पटना जाएगी और जिसे वापस जाना हो वह बस में बैठ सकता है। शर्त यह थी कि उस यात्रा के लिए दोगुना भाड़ा देना होगा।

मैंने देखा कि कई लोग आगे जा रहे थे ताकि कटाव की भयावहता का अंदाजा लगा सकें। मैं भी उन लोगों के पीछे चल पड़ा। कोई चार सौ मीटर जाने पर साफ दिखने लगा कि सड़क कट चुकी थी और कटाव से होकर बहुत तेज आवाज के साथ उफान मारती धारा बह रही थी।

कुछ स्थानीय लोग यात्रियों को कटाव पार कराने की बात कर रहे थे। कटाव की दूसरी तरफ बसों और अन्य गाड़ियों की लाइन लगी थी। थोड़ा और देखने पर पता चला कि कुछ युवक लोगों को पर कराने के काम में लगे हुए थे। पार कराने का ढ़ंग अनोखा था लेकिन बहुत भयावह था।

एक अधेड़ उम्र का बहुत मोटा ताजा व्यक्ति एक पतले दुबले युवक के कंधे पर सवार था। युवक के कृषकाय बदन पर लंगोटी के अलावा कुछ भी नहीं था। उसके ऊपर वह मोटा रईस पूरे सूट बूट पहने बैठा था और अपने सिर के ऊपर अपना ब्रीफकेस रखे हुए था। जब युवक उसे लेकर उस कटाव की तेज धारा से पार कर रहा था तो देखने वालों की सांसें अटकी हुई थीं। सबकी जान में जान तब आई जब उस युवक ने उस मोटे आदमी को सुरक्षित दूसरी तरफ उतार दिया।


ध्वनि

अभी-अभी तो आया है मेरे मन में मृदुल वसंत अभी न होगा मेरा अंत

लाख की चूड़ियाँ

समय बदलता है और लाख की चूड़ियों की जगह काँच की चूड़ियाँ लोकप्रिय हो जाती हैं। धीरे-धीरे बदलू की बनाई चूड़ियों की माँग न के बराबर रह जाती है।

बस की यात्रा

बस बहुत पुरानी हो चुकी है और नियमित रखरखाव के अभाव में पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। बस को देखकर किसी को यकीन नहीं हो सकता है कि वह चल भी पाती है।

दीवानों की हस्ती

हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते साथ चले।

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

जैसे फास्ट फूड कभी भी पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद नहीं दे सकते हैं, उसी तरह पत्र का स्थायित्व कभी भी फोन या एसएमएस द्वारा नहीं मिल सकता है। एक पत्र को बार बार पढ़ा जा सकता है।

भगवान के डाकिये

पक्षी और बादल ये भगवान के डाकिये हैं, जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं

क्या निराश हुआ जाए

लेखक धोखा खाने के बाद भी निराश नहीं हुआ है। इसकी वजह है लेखक का जीवन के प्रति सकारात्मक रुख।

यह सबसे कठिन समय नहीं

नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं, अभी भी दबा है चिड़िया की चोंच में तिनका और वह उड़ने की तैयारी में है

कबीर

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

कामचोर

उस घर में नौकर चाकरों की कमी नहीं थी। बच्चों को अपना कोई भी काम करने की आदत नहीं थी। इसलिए उनके अब्बा ने उन्हें नाकारा कहा है।

जब सिनेमा ने बोलना सीखा

जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर निम्नलिखित वाक्य छपे थे, “वे सभी सजीव है, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिन्दा हो गए, उनको बोलते बातें करते देखो”।

सुदामा चरित

सीस पगा न झँगा तन में, प्रभु! जाने को आहि बसे केहि ग्रामा। धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह ओ नहिं सामा॥

जहाँ पहिया है

साइकिल आंदोलन ने पुडुकोट्टई की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। महिलाएँ अब पहले से अधिक स्वतंत्र हो गई हैं।

अकबरी लोटा

झाऊलाल मुंडेर के पास खड़े होकर जब लोटे से पानी पी रहे होते हैं तभी लोटा उनके हाथ से छूट जाता है और नीचे खड़े एक अंग्रेज को घायल कर देता है।

सूर के पद

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी? किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।

पानी की कहानी

पानी का निर्माण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से होता है। इसलिए पानी ने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अपना पूर्वज कहा है।

बाज और साँप

बाज और साँप एक दूसरे उतने ही विपरीत हैं जितने की उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। बाज रफ्तार और स्वतंत्रता का प्रतीक है जबकि साँप मंथर गति का प्रतीक है जिसकी दुनिया में विस्तार नाम की चीज नहीं है।

टोपी

गवरैया का मन टोपी पहनने का हो रहा था। गवरा जानता था कि इंसानों में अपनी झूठी मर्यादा बचाने की कैसी होड़ मची रहती है।