8 हिंदी वसंत

लाख की चूड़ियाँ

सारांश

इस कहानी के लेखक हैं कामतानाथ।

यह कहानी एक शहरी युवक और एक ग्रामीण शिल्पकार के बारे में है। इस कहानी में मशीनीकरण के एक ज्वलंत कुप्रभाव के बारे में बताया गया है।

गाँव में बदलू नाम का एक शिल्पकार रहता है जो पेशे से मनिहार है। वह लाख की चूड़ियाँ बनाता है और उन्हें बेचकर अपनी जीविका चलाता है। उसके गाँव में और आस पास के गाँवों में उसकी बनाई चूड़ियों की अच्छी खासी माँग रहती है।

पुरानी परंपराओं के हिसाब से चलने वाला वह आदमी अपनी बनाई चूड़ियों की कोई कीमत नहीं लगाता है। चूड़ियों के बदले में जो कुछ अनाज पानी मिल जाता है उन्हीं से वह संतुष्ट रहता है। हाँ शादी जैसे अहम मौकों पर वह अपनी पूरी कीमत वसूलता है।

समय बदलता है और लाख की चूड़ियों की जगह काँच की चूड़ियाँ लोकप्रिय हो जाती हैं। धीरे-धीरे बदलू की बनाई चूड़ियों की माँग न के बराबर रह जाती है। कमाई समाप्त होने का असर उसकी सेहत पर भी पड़ता है। ढ़लती उम्र में वह असहाय सा हो जाता है और मशीन से बनी चूड़ियों को कोसता है।

ऐसा सदियों से होता आया है। जब भी कोई नई टेक्नॉलोजी आती है उससे काम करने में तेजी तो आती है लेकिन कई लोगों का रोजगार छिन जाता है। जब कपड़ा उद्योग विकसित हुआ तो उससे पारंपरिक बुनकरों का रोजगार छिन गया। जब कम्प्यूटर का युग आया तो उससे टाइपराइटर पर काम करने वालों का जीवन संकट में पड़ गया। इसी तरह के बदलाव भविष्य में होते रहेंगे और उनकी चपेट में आने से लाखों लोगों की आजीविका पर संकट आ जाएगा।

NCERT Solution

प्रश्न 1: बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से क्यों जाता था और बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ क्यों कहता था?

उत्तर: चूँकि बदलू लेखक के ननिहाल का था इसलिए उसे ‘बदलू मामा’ कहा जाना चाहिए। लेकिन गाँव के अन्य बच्चे उसे ‘बदलू काका’ कहते थे। उनकी देखा-देखी लेखक भी उसे ‘बदलू काका’ ही कहा करता था। ऐसा अक्सर देखने को मिलता है। कई बच्चे अपने माँ-बाप की देखादेखी अपनी दादी या नानी को माँ या अम्मा कहकर ही बुलाते हैं।

प्रश्न 2: वस्तु विनिमय क्या है? विनिमय की प्रचलित पद्धति क्या है?

उत्तर: किसी चीज के बदले कोई दूसरी चीज खरीदने या बेचने की पद्धति को वस्तु विनिमय कहते हैं। आज भी गाँवों में लोग अनाज के बदले दूसरे सामान खरीदते हैं। यहाँ तक कि महानगरों की झुग्गी झोपड़ियों में भी लेन देन का कुछ हिस्सा वस्तु विनिमय पद्धति से होता है। अब ज्यादातर जगह रुपयों से हम चीजें खरीदते हैं, और यही सबसे प्रचलित विनिमय पद्धति है। पैसों के इस्तेमाल के शुरु होने से पहले वस्तु विनिमय ही उपयोग में आती थी।

प्रश्न 3: “मशीनी युग ने कितने हाथ काट दिए हैं,” इस पंक्ति में लेखक ने किस व्यथा की ओर संकेत किया है?

उत्तर: बदलू की कमाई का एकमात्र साधन था, लाख की चूड़ियाँ बनाना। मशीनों से बनी शीशे की चूड़ियाँ सस्ती और ज्यादा रंग बिरंगी होती हैं। इससे उनका प्रचलन बढ़ गया है और बदलू के जैसे हाथ ही काट दिए गए हों। लेखक ने यहाँ पर बदलू की लाचारी की ओर संकेत किया है। यह लाचारी रोजगार छिन जाने के कारण आती है।

यदि आप इतिहास की किताब पढ़ेंगे तो कई जगह आपको लिखा मिलेगा कि अंग्रेजों ने भारत के बुनकरों के हाथ काट दिए। दरअसल, जब मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़े भारत में बिकने लगे तो उनके आगे यहाँ के बुनकरों द्वारा बनाए कपड़े टिक नहीं पाए। समय बीतने के साथ भारत के पारंपरिक बुनकर बेरोजगार हो गए। इसलिए कहा जाता है कि उनके हाथ ही कट गए।

प्रश्न 4: बदलू के मन में ऐसी कौन सी व्यथा थी जो लेखक से छिपी न रह सकी?

उत्तर: बदलू अब हताश हो चुका था, क्योंकि उसकी कला को सराहने वाला कोई नहीं रहा। अब उसकी उम्र भी वह नहीं रह गई थी जिसमें वह नए काम सीख सकता था। बदलू के भविष्य में अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था। लेखक भविष्य के प्रति बदलू की चिंता का आकलन कर रहा था।

प्रश्न 5: मशीन युग से बदलू के जीवन में क्या बदलाव आया?

उत्तर: बदलू ने अपनी गाय बेच दी थी। यह एक तरह से अतिरिक्त कमाई का जरिया खत्म करने जैसा है। ग्रामीणों के लिए गाय एक आय का साधन होती है। यह उसी तरह से है जैसे कोई बड़ा व्यवसायी अपनी दुकानों की श्रृंखला में कमी करने लगे। निराशा के मारे बदलू अस्वस्थ भी रहने लगा था। वह पहले की तरह जिंदादिल भी नहीं रहा। जब लेखक ने आम की बात निकाली तब बदलू को आम खिलाने की बात ध्यान में आई।

कुल मिलाकर बूढ़ा बदलू उस हारे हुए जुआरी की तरह हो गया था जो अपने बीते दिनों को याद करके थोड़ा खुश तो हो लेता है, लेकिन भविष्य की चिंता उसे अंदर ही अंदर से खाए जाती है।


ध्वनि

अभी-अभी तो आया है मेरे मन में मृदुल वसंत अभी न होगा मेरा अंत

लाख की चूड़ियाँ

समय बदलता है और लाख की चूड़ियों की जगह काँच की चूड़ियाँ लोकप्रिय हो जाती हैं। धीरे-धीरे बदलू की बनाई चूड़ियों की माँग न के बराबर रह जाती है।

बस की यात्रा

बस बहुत पुरानी हो चुकी है और नियमित रखरखाव के अभाव में पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। बस को देखकर किसी को यकीन नहीं हो सकता है कि वह चल भी पाती है।

दीवानों की हस्ती

हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते साथ चले।

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

जैसे फास्ट फूड कभी भी पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद नहीं दे सकते हैं, उसी तरह पत्र का स्थायित्व कभी भी फोन या एसएमएस द्वारा नहीं मिल सकता है। एक पत्र को बार बार पढ़ा जा सकता है।

भगवान के डाकिये

पक्षी और बादल ये भगवान के डाकिये हैं, जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं

क्या निराश हुआ जाए

लेखक धोखा खाने के बाद भी निराश नहीं हुआ है। इसकी वजह है लेखक का जीवन के प्रति सकारात्मक रुख।

यह सबसे कठिन समय नहीं

नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं, अभी भी दबा है चिड़िया की चोंच में तिनका और वह उड़ने की तैयारी में है

कबीर

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

कामचोर

उस घर में नौकर चाकरों की कमी नहीं थी। बच्चों को अपना कोई भी काम करने की आदत नहीं थी। इसलिए उनके अब्बा ने उन्हें नाकारा कहा है।

जब सिनेमा ने बोलना सीखा

जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर निम्नलिखित वाक्य छपे थे, “वे सभी सजीव है, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिन्दा हो गए, उनको बोलते बातें करते देखो”।

सुदामा चरित

सीस पगा न झँगा तन में, प्रभु! जाने को आहि बसे केहि ग्रामा। धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह ओ नहिं सामा॥

जहाँ पहिया है

साइकिल आंदोलन ने पुडुकोट्टई की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। महिलाएँ अब पहले से अधिक स्वतंत्र हो गई हैं।

अकबरी लोटा

झाऊलाल मुंडेर के पास खड़े होकर जब लोटे से पानी पी रहे होते हैं तभी लोटा उनके हाथ से छूट जाता है और नीचे खड़े एक अंग्रेज को घायल कर देता है।

सूर के पद

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी? किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।

पानी की कहानी

पानी का निर्माण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से होता है। इसलिए पानी ने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अपना पूर्वज कहा है।

बाज और साँप

बाज और साँप एक दूसरे उतने ही विपरीत हैं जितने की उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। बाज रफ्तार और स्वतंत्रता का प्रतीक है जबकि साँप मंथर गति का प्रतीक है जिसकी दुनिया में विस्तार नाम की चीज नहीं है।

टोपी

गवरैया का मन टोपी पहनने का हो रहा था। गवरा जानता था कि इंसानों में अपनी झूठी मर्यादा बचाने की कैसी होड़ मची रहती है।