8 हिंदी वसंत

टोपी

NCERT Solution

प्रश्न 1: गवरैया और गवरे के बीच किस बात पर बहस हुई और गवरैया को अपनी इक्षा पूरी करने का मौका कैसे मिला?

उत्तर: गवरैया का मन टोपी पहनने का हो रहा था। गवरा जानता था कि इंसानों में अपनी झूठी मर्यादा बचाने की कैसी होड़ मची रहती है। किस तरह से इंसान एक दूसरे को हमेशा नीचा दिखाने की ताक में रहता है। अंतत: गवरैये को एक रुई का फाहा मिल गया जिससे उसे टोपी बनवाने की प्रेरणा मिली।

प्रश्न 2: गवरैया और गवरे के बीच तर्कों को संवाद के रूप में लिखें।

उत्तर: गवरैया, “आदमी कपड़े पहनकर कितना सुंदर लगता है।“
गवरा, “नहीं, कपड़े प्राकृतिक सुंदरता को ढ़ँक लेते हैं।“
गवरैया, “राजा के सिर पर टोपी कितनी सुंदर लगती है।“
गवरा, “टोपी एक अहंकार का कारण बनती है। अपनी टोपी बचाने के लिए लोग दूसरे की टोपियाँ गिराने की ताक में रहते हैं।“

जब गवरैये को रुई का फाहा मिल जाता है तब
गवरैया, “आखिर मुझे वो चीज मिल गई जिससे मेरी टोपी बन सकती है।“
गवरा, “फाहा तो मिल गया लेकिन टोपी कैसे बनवाएगी। फाहे से टोपी तक का सफर बहुत लम्बा होता है। इसलिए इस चक्कर में ना ही पड़ो तो अच्छा होगा।“

प्रश्न 3: टोपी बनवाने के लिए गवरैया किस किस के पास गयी? टोपी बनने तक एक-एक कार्यों को लिखें।

उत्तर: सबसे पहले गवरैया एक धुनिये के पास जाती है। धुनिया राजा की रजाई के लिए रुई धुन रहा होता है। पहले तो वो राजा के डर से गवरैये का काम करने से इनकार कर देता है। फिर जब आधी मजदूरी की बात आती है तो वह तैयार हो जाता है।

उसके बाद गवरैया कोरी या तांती के पास जाती है। वह भी अच्छी मजदूरी का नाम सुनते ही तैयार हो जाता है।

फिर गवरैया बुनकर के पास जाती है और आखिर में दर्जी के पास जाती है। ये सभी राजा का काम कर रहे होते हैं। लेकिन जब गवरैया ज्यादा मेहनताना देने की बात करती है तो वे गवरैया का काम करने को तैयार हो जाते हैं।

सभी अच्छी कीमत के कारण गवरैये का काम पूरी लगन से करते हैं।

प्रश्न 4: गवरैया की टोपी पर दर्जी ने पाँच फुदने क्यों जड़ दिए?

उत्तर: गर्जी गवरैये की उदारता से प्रभावित हो जाता है । इसलिए तोहफे के रूप में वह पाँच फुदने जड़ देता है।


ध्वनि

अभी-अभी तो आया है मेरे मन में मृदुल वसंत अभी न होगा मेरा अंत

लाख की चूड़ियाँ

समय बदलता है और लाख की चूड़ियों की जगह काँच की चूड़ियाँ लोकप्रिय हो जाती हैं। धीरे-धीरे बदलू की बनाई चूड़ियों की माँग न के बराबर रह जाती है।

बस की यात्रा

बस बहुत पुरानी हो चुकी है और नियमित रखरखाव के अभाव में पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। बस को देखकर किसी को यकीन नहीं हो सकता है कि वह चल भी पाती है।

दीवानों की हस्ती

हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते साथ चले।

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

जैसे फास्ट फूड कभी भी पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद नहीं दे सकते हैं, उसी तरह पत्र का स्थायित्व कभी भी फोन या एसएमएस द्वारा नहीं मिल सकता है। एक पत्र को बार बार पढ़ा जा सकता है।

भगवान के डाकिये

पक्षी और बादल ये भगवान के डाकिये हैं, जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं

क्या निराश हुआ जाए

लेखक धोखा खाने के बाद भी निराश नहीं हुआ है। इसकी वजह है लेखक का जीवन के प्रति सकारात्मक रुख।

यह सबसे कठिन समय नहीं

नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं, अभी भी दबा है चिड़िया की चोंच में तिनका और वह उड़ने की तैयारी में है

कबीर

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

कामचोर

उस घर में नौकर चाकरों की कमी नहीं थी। बच्चों को अपना कोई भी काम करने की आदत नहीं थी। इसलिए उनके अब्बा ने उन्हें नाकारा कहा है।

जब सिनेमा ने बोलना सीखा

जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर निम्नलिखित वाक्य छपे थे, “वे सभी सजीव है, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, अठहत्तर मुर्दा इंसान जिन्दा हो गए, उनको बोलते बातें करते देखो”।

सुदामा चरित

सीस पगा न झँगा तन में, प्रभु! जाने को आहि बसे केहि ग्रामा। धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह ओ नहिं सामा॥

जहाँ पहिया है

साइकिल आंदोलन ने पुडुकोट्टई की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है। महिलाएँ अब पहले से अधिक स्वतंत्र हो गई हैं।

अकबरी लोटा

झाऊलाल मुंडेर के पास खड़े होकर जब लोटे से पानी पी रहे होते हैं तभी लोटा उनके हाथ से छूट जाता है और नीचे खड़े एक अंग्रेज को घायल कर देता है।

सूर के पद

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी? किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।

पानी की कहानी

पानी का निर्माण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से होता है। इसलिए पानी ने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अपना पूर्वज कहा है।

बाज और साँप

बाज और साँप एक दूसरे उतने ही विपरीत हैं जितने की उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। बाज रफ्तार और स्वतंत्रता का प्रतीक है जबकि साँप मंथर गति का प्रतीक है जिसकी दुनिया में विस्तार नाम की चीज नहीं है।

टोपी

गवरैया का मन टोपी पहनने का हो रहा था। गवरा जानता था कि इंसानों में अपनी झूठी मर्यादा बचाने की कैसी होड़ मची रहती है।