गीत अगीत

रामधारी सिंह दिनकर

इस कविता में कवि रामधारी सिंह दिनकर बताया है कि हमारे चारों ओर गीत के साथ साथ अगीत भी व्याप्त रहता है। यहाँ पर गीत का मतलब है शब्दों के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रकट करना। वहीं दूसरी ओर, अगीत का मतलब है बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह देना। कवि का कहना है कि इससे एक दुविधा की स्थिति बन जाती है। यह तय कर पाना मुश्किल होता है कि गीत और अगीत में से कौन सुंदर है।

गाकर गीत विरह के तटिनी
वेगवती बहती जाती है,
दिल हलका कर लेने को
उपलों से कुछ कहती जाती है।
तट पर एक गुलाब सोचता
"देते स्वर यदि मुझे विधाता,
अपने पतझर के सपनों का
मैं भी जग को गीत सुनाता।"
गा गाकर बह रही निर्झरी,
पाटल मूक खड़ा तट पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?



कविता के पहले भाग में कवि ने नदी और गुलाब के द्वारा गीत और अगीत को समझाने की कोशिश की है। नदी तेजी से बहती जाती है जबकि गुलाब एक स्थान पर स्थिर रहता है। नदी जब आगे बढ़ती है तो उसकी कलकल से एक संगीत निकलता है। ऐसा लगता है जैसे नदी विरह के गीत गा रही है। नदी उन किनारों से कुछ कहती है जिनसे बिछड़कर वह आगे बढ़ती रहती है।

वहीं किनारे पर एक गुलाब सोच रहा है कि भगवान ने उसे बोलने की शक्ति क्यों नहीं दी। यदि वह बोल पाता तो वह भी पूरी दुनिया को अपना गीत सुनाता।

एक तरफ नदी गाते हुए चलती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ गुलाब चुपचाप खड़ा है। ऐसे में कवि सवाल करता है कि कौन सुंदर है, नदी का गीत या फिर गुलाब का अगीत।

बैठा शुक उस घनी डाल पर
जो खोंते को छाया देती।
पंख फुला नीचे खोंते में
शुकी बैठ अंडे है सेती।
गाता शुक जब किरण वसंती
छूती अंग पर्ण से छनकर।
किंतु, शुकी के गीत उमड़कर
रह जाते सनेह में सनकर।
गूँज रहा शुक का स्वर वन में,
फूला मग्न शुकी का पर है।
गीत, अगीत, कौन सुंदर है?


कविता के दूसरे भाग में कवि ने शुक और शुकी के बारे में कहा है। तोते को शुक कहते हैं। तोता एक घनी डाल पर बैठा है और उसी डाल की छाया में उसका घोंसला है। उस घोंसले में शुकी अपने अंडों को से रही है। जब पत्तियों से छनकर सूर्य की किरणें तोते के परों पर पड़ती हैं तो तोता गाने लगता है। लेकिन शुकी गा नहीं पाती है और मन ही मन में अपने प्यार का इजहार करती है।

एक तरफ तोते का गीत पूरे जंगल में गूँज रहा है, वहीं दूसरी ओर शुकी मन ही मन फूले नहीं समा रही है।

दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब
बड़े साँझ आल्हा गाता है,
पहला स्वर उसकी राधा को
घर से यहीं खींच लाता है।

चोरी-चोरी छिपकर सुनती है,
"हुई न क्यों मैं कड़ी गीत की
बिधना", यों मन में गुनती है।
वह गाता, पर किसी वेग से
फूल रहा इसका अंतर है।
गीत, अगीत कौन सुंदर है?

कविता के तीसरे भाग में कवि ने दो प्रेमियों के बारे में बताया है। जब प्रेमी शाम में आल्हा गाने लगता है तो उस गीत को सुनकर उसकी प्रेमिका खिंची चली आती है। आल्हा एक लोकगीत का नाम है। प्रेमिका छुप छुपकर उस गीत को सुनती है और सोचती है कि भगवान ने उसका नाम उस गीत में शामिल क्यों नहीं किया है।

एक तरफ प्रेमी गला खोलकर गा रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रेमिका मन ही मन फूले नहीं समा रही है। प्रेमिका के मुँह से एक स्वर नहीं निकल रहा है। उसकी खामोशी भी उतनी ही सुंदर लग रही है जितनी कि उसके प्रेमी का गीत।



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