9 हिंदी

दुख का अधिकार

यशपाल

NCERT Solution:

Part 2

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50 – 60 शब्दों में लिखिए:

Question 1: बाजर के लोग खरबूजे बेचनेवाली स्त्री के बारे में क्या-क्या कह रहे थे? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: बाजार के लोग खरबूजे बेचनेवाली स्त्री के बारे में तरह तरह की बातें कर रहे थे। कोई कह रहा था कि बेटे की मृत्यु के तुरंत बाद बुढ़िया को बाहर निकलना ही नहीं चाहिए था। कोई कह रहा था कि सूतक की स्थिति में वह दूसरे का धर्म भ्रष्ट कर सकती थी इसलिए उसे नहीं निकलना चाहिए था। किसी ने कहा, कि ऐसे लोगों के लिए रिश्तों नातों की कोई अहमियत नहीं होती। वे तो केवल रोटी को अहमियत देते हैं। अधिकांश लोग उस स्त्री को तिरस्कार की नजर से देख रहे थे।

Question 2: पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को क्या पता चला?

उत्तर: पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को उस बुढ़िया के दुख के बारे में पता चला। लेखक को पता चला कि बुढ़िया का इकलौता बेटा साँप के काटने से मर गया था। बुढ़िया के घर में उसकी बहू और पोते पोती रहते थे। बुढ़िया का सारा पैसा बेटे के इलाज में खर्च हो गया था। बहू को तेज बुखार था। इसलिए अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए बुढ़िया को खरबूजे बेचने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा था।

Question 3: लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया ने क्या-क्या उपाय किए?

उत्तर: लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया ने जो उचित समझ में आया किया। उसने झटपट ओझा को बुलाया। ओझा ने झाड़फूँक शुरु किया। ओझा को दान दक्षिणा देने के लिए बुढ़िया ने घर में जो कुछ था दे दिया। घर में नागदेव की पूजा भी करवाई।

Question 4: लेखक ने बुढ़िया के दुख का अंदाजा कैसे लगाया?

उत्तर: लेखक ने बुढ़िया के दुख का अंदाजा पहले तो बुढ़िया के रोने से लगाया। लेखक को लगा कि जो स्त्री खरबूजे बेचने के लिए आवाज लगाने की बजाय अपना मुँह ढ़क कर रो रही हो वह अवश्य ही गहरे दुख में होगी। फिर लेखक ने देखा कि अन्य लोग बुढ़िया को बड़े तिरस्कार की दृष्टि से देख रहे थे। इससे भी लेखक ने बुढ़िया के दुख का अंदाजा लगाया।

Question 5: इस पाठ का शीर्षक ‘दुख का आधिकार’ कहाँ तक सार्थक है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पाठ में मुख्य पात्र एक बुढ़िया है जो पुत्र शोक से पीड़ित है। उस बुढ़िया की तुलना एक अन्य स्त्री से की गई है जिसने ऐसा ही दर्द झेला था। दूसरी स्त्री एक संपन्न घर की थी। इसलिए उस स्त्री ने ढ़ाई महीने तक पुत्र की मृत्यु का शोक मनाया था। उसके शोक मनाने की चर्चा कई लोग करते थे। लेकिन बुढ़िया की गरीबी ने उसे पुत्र का शोक मनाने का भी मौका नहीं दिया। बुढ़िया को मजबूरी में दूसरे ही दिन खरबूजे बेचने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा। ऐसे में लोग उसे हिकारत की नजर से ही देख रहे थे। एक स्त्री की संपन्नता के कारण शोक मनाने का पूरा अधिकार मिला वहीं दूसरी स्त्री इस अधिकार से वंचित रह गई। इसलिए इस पाठ का शीर्षक बिलकुल सार्थक है।

निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:

Question 1: जैसे वायु की लहरें कटी हूई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है।

उत्तर: कोई भी पतंग कटने के तुरंत बाद जमीन पर धड़ाम से नहीं गिरती। हवा की लहरें उस पतंग को बहुत देर तक हवा में बनाए रखती हैं। पतंग धीरे-धीरे बल खाते हुए जमीन की ओर गिरती है। हमारी पोशाक भी हवा की लहरों की तरह काम करती है। कई ऐसे मौके आते हैं कि हम अपनी पोशाक की वजह से झुककर जमीन की सच्चाई जानने से वंचित रह जाते हैं। इस पाठ में लेखक अपनी पोशाक की वजह से बुढ़िया के पास बैठकर उससे बात नहीं कर पाता है।

Question 2: इनके लिए बेटा-बेटी, खसम-लुगाई, धर्म-ईमान सब रोटी का टुकड़ा है।

उत्तर: यह एक प्रकार का कटाक्ष है जो किसी की गरीबी और उससे उपजी मजबूरी का उपहास उड़ाता है। जो व्यक्ति यह कटाक्ष कर रहा है उसे सिक्के का एक पहलू ही दिखाई दे रहा है। हर व्यक्ति रिश्तों नातों की मर्यादा रखना चाहता है। लेकिन जब भूख की मजबूरी होती है तो कई लोगों को मजबूरी में यह मर्यादा लांघनी पड़ती है। उस बुढ़िया के साथ भी यही हुआ था। बुढ़िया को न चाहते हुए भी खरबूजे बेचने के लिए निकलना पड़ा था।

Question 3: शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और ... दुखी होने का भी एक अधिकार होता है।

उत्तर: शोक मनाने की सहूलियत भगवान हर किसी को नहीं देता है। कई बार जीवन में कुछ ऐसी मजबूरियाँ या जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं कि मनुष्य को शोक मनाने का मौका भी नहीं मिलता। यह बात खासकर से किसी गरीब पर अधिक लागू होती है। गरीब को तो शोक मनाने का अधिकार ही नहीं होता है।



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