Class 10 Hindi Sparsh

प्रह्लाद अग्रवाल

तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक दो पंक्तियों में दीजिए:
  • ‘तीसरी कसम’ फिल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?

    उत्तर: ‘तीसरी कसम’ फिल्म को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक मिला था। इसे बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसियेशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। इसे मास्को फिल्म फेस्टिवल में भी पुरस्कृत किया गया था।
  • शैलेंद्र ने कितनी फिल्में बनाईं?

    उत्तर: शैलेंद्र ने केवल एक ही फिल्म बनाई थी; तीसरी कसम।
  • राज कपूर द्वारा निर्देशित कुछ फिल्मों के नाम बताइए।

    उत्तर: मेरा नाम जोकर, सत्यम शिवम सुंदरम, राम तेरी गंगा मैली
  • ‘तीसरी कसम’ फिल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फिल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?

    उत्तर: इस फिल्म में राज कपूर ने हीरामन की और वहीदा रहमान ने हीराबाई की भूमिका निभाई थी।
  • फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण किसने किया था?

    उत्तर: शैलेंद्र
  • राज कपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?

    उत्तर: इस फिल्म के निर्माण के समय राज कपूर ने इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इसके एक भाग को ही बनाने में छ: साल लग जाएंगे।
  • राज कपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?

    उत्तर: जब राज कपूर ने शैलेंद्र से एडवांस में अपना पारिश्रमिक माँगा तो इस पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया।
  • फिल्म समीक्षक राज कपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?

    उत्तर: फिल्म समीक्षक राज कपूर को आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते थे।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर २५ – ३० शब्दों में लिखिए:

  • ‘तीसरी कसम’ फिल्म को ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?

    उत्तर: तीसरी कसम आम मसाला फिल्मों से हटकर है। इसमें गाँव के जीवन का बड़ा ही सटीक चित्रण हुआ है। मुख्य कलाकार राज कपूर और वहीदा रहमान ने अपने सहज अभिनय से ग्रामीण के किरदार में जान फूँक दी है। इसलिए तीसरी कसम को सैल्युलाइड पर लिखी कविता कहा गया है।
  • ‘तीसरी कसम’ फिल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?

    उत्तर: तीसरी कसम व्यावसायिक दृष्टिकोण से अच्छी फिल्म नहीं थी। खरीददारों को तो अपने पैसे पर लाभ कमाने की चिंता ज्यादा होती है। उनके लिए फिल्म की संवेदनशीलता का कोई महत्व नहीं होता है। इसलिए तीसरी कसम को खरीददार नहीं मिल रहे थे।
  • शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?

    उत्तर: शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का यह भी कर्तव्य होता है कि वह दर्शकों की रुचियों का परिष्कार करने को भी तैयार रहे। उनके अनुसार कलाकार को दर्शकों को नए दृष्टिकोण से विषय वस्तु को देखने की कला सिखानी चाहिए।
  • फिल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफाई क्यों कर दिया जाता है?

    उत्तर: फिल्मकार हमेशा दर्शकों का भावनात्मक शोषण करना चाहते हैं। इसलिए फिल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफाई कर दिया जाता है।
  • ‘शैलेंद्र ने राज कपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’ – इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: तीसरी कसम की सशक्त पटकथा और गीत ने राज कपूर के अभिनय के साथ एक जादुई प्रभाव बनाया है। एक अभिनेता जब पूरी तन्मयता से अभिनय करता है तो किरदार में वह अपनी पूरी भावना उड़ेल देता है। एक अच्छे निर्देशक की तरह शैलेंद्र ने राज कपूर की भावनाओं को इस फिल्म में पूरी तरह से उजागर किया है।
  • लेखक ने राज कपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: शोमैन उस शख्स को कहा जाता है जो लोकप्रियता के चरम शिखर पर होता है। उसके बारे में किंवदंतियाँ मशहूर हो जाती हैं। उसकी चाल ढ़ाल, उसकी पोशाक और उसके बात करने के लहजे का हर कोई अनुसरण करना चाहता है। लोग उसकी एक झलक देखकर पागल हो जाते हैं। राज कपूर में ये सारी खूबियाँ थीं। इसलिए लेखक ने राज कपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है।
  • फिल्म ‘श्री ४२०’ के गीत ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?

    उत्तर: जयकिशन का कहना था कि यथार्थ में चार दिशाएँ होती हैं और दर्शकों को दस दिशाएँ शायद समझ में ना आयें। इसलिए जयकिशन ने ‘दस दिशाओं’ पर आपत्ति की थी।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर ५० – ६० शब्दों में लिखिए:
  • राज कपूर द्वारा फिल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फिल्म क्यों बनाई?

    उत्तर: हालांकि शैलेंद्र फिल्म इंडस्ट्री में काफी अरसे से थे, फिर भी उन्हें यश या धन की लालसा नहीं थी। वे तो अपनी कृति से आत्मसुख प्राप्त करना चाहते थे। वह अपने अंदर के कलाकार का गला घोंट कर काम करना नहीं चाहते थे। इसलिए राज कपूर के आगाह करने के बावजूद भी उन्होंने यह फिल्म बनाई।
  • ‘तीसरी कसम’ में राज कपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: राज कपूर हीरामन की आत्मा में उतर गया लगता है। वह खालिस भुच्च जुबान बोलता है। किसी पक्के देहाती की तरह वह हीराबाई की एक-एक अदा पर रीझता है। उसके उकड़ू बैठने का ढ़ंग, बातें करने का ढ़ंग, निराश होने का ढ़ंग; सब में हीरामन ही दिखता है। राज कपूर का व्यक्तित्व कहीं भी नजर नहीं आता है।
  • लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?

    उत्तर: तीसरी कसम में ग्रामीण जीवन का सटीक चित्रण हुआ है। किरदारों की पोशाकों से लेकर उनके हाव भाव और बात करने के ढ़ंग तक में लोक जीवन की छाप मिलती है। हालाँकी इस फिल्म में उस जमाने के बड़े-बड़े कलाकारों ने काम किया है, लेकिन किसी भी कलाकार का व्यक्तित्व किरदार पर हावी नहीं हुआ। फिल्म के गीत संगीत ने भी गाँव के माहौल को बखूबी पकड़ा है।
  • शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिखिए।

    उत्तर: शैलेंद्र के गीत बड़ी ही साधारण भाषा में होते थे, जिससे आम लोगों को भी उनकी समझ हो जाए। उनके गीतों में झूठे आभिजात्य का अभाव था। लेखन ने उनके गीतों को शांत नदी के प्रवाह और समुद्र की गहराई से युक्त कहा है। इसका मतलब है कि शैलेंद्र के गीतों में शांत नदी जैसी सरलता होती थी और समुद्र की गहराई जैसे अर्थ छुपे हुए थे।
  • फिल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

    उत्तर: व्यावसायिक दृष्टि से शैलेंद्र अच्छे निर्माता नहीं थे। मूल रूप से वे एक कवि थे। फिल्में बनाते समय भी उनका कवि हृदय ही मुखर होता था। इसलिए वे भावप्रधान फिल्म बना सकते थे। वे मूल रचना के साथ शत प्रतिशत न्याय करने में विश्वास रखते थे।
  • शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फिल्मों में झलकती है – कैसे? स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: अपने निजी जीवन में शैलेंद्र एक सरल इंसान थे जिनके अंदर असीम गहराई थी। उनकी फिल्में और उनके गीतों में भी यही बात होती थी। ऊपरी तौर पर तीसरी कसम एक साधारण से देहात की पृष्ठभूमि की फिल्म लगती है। लेकिन जिस प्रकार से इस फिल्म में लोक जीवन का चित्रण हुआ है वह इस फिल्म की गहराई को दर्शाता है।
  • लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ फिल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: अक्सर फिल्मकार व्यावसायिक सफलता के चक्कर में फिल्म की आत्मा के साथ खिलवाड़ करते हैं। ज्यादातर फिल्मों में ग्रामीण पृष्ठभूमि का मतलब होता है भड़काऊ पोशाक और संगीत। कभी‌-कभी जरूरत से ज्यादा हिंसा भी भरी होती है। लेकिन शैलेंद्र ने तो आम आदमी के जीवन को लेकर फिल्म बनाई है। तीसरी कसम के गीतों में कहीं भी भड़काऊपन नहीं है, बल्कि नौटंकी शैली का गीत और संगीत है। इसमें ग्रामीण जीवन की हताशा का भी चित्रण है, लेकिन उसे दिखाने के लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया गया है। इस तरह का चित्रण कोई कवि हृदय ही कर सकता है।

निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए:

  • वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।

    उत्तर: इन पंक्तियों में शैलेंद्र के कवि हृदय व्यक्तित्व के बारे में बताया गया है। शैलेंद्र कभी भी धन या यश की लालच में गीत नहीं लिखते थे बल्कि अपनी आत्म संतुष्टि के लिए गीत लिखते थे।
  • उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।

    उत्तर: शैलेंद्र को फार्मूला फिल्मों की तरह फिल्मों में मसाले भरने से सख्त परहेज था। वे उथली बातों को इस बहाने नहीं थोपना चाहते थे कि अधिकतर लोगों की रुचि वैसी ही उथली बातों में थी। साथ में वे ये भी मानते थे कि दर्शकों में अच्छी चीजों के प्रति संवेदनशीलता जगाना भी कलाकार का कर्तव्य होता है।
  • व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।

    उत्तर: जिंदगी में आदमी को सुख के साथ हताशा और व्यथा भी मिलती है। लेकिन व्यथा और दुख से आदमी को निराश नहीं होना चाहिए। कहा जाता है कि असफलता तो सफलता के लिए सीढ़ी का काम करती है। इस तरह से यह कहा जा सकता है कि व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।
  • दरअसल इस फिल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।

    उत्तर: जब ‘तीसरी कसम’ फिल्म बनी तो उसे कोई भी वितरक खरीदने को तैयार नहीं था। किसी भी वितरक के लिए लाभ कमाने की मंशा सर्वोपरी होती है। शैलेंद्र की फिल्म में ऐसी कोई गारंटी नहीं थी। उनकी फिल्म व्यावसायिक सफलता की गारंटी नहीं दे रही थी।
  • उनके गीत भाव प्रवण थे दुरूह नहीं।

    उत्तर: शैलेंद्र के गीतों की भाषा अत्यंत सरल हुआ करती थी। ऐसी भाषा को आम जनमानस आसानी से समझ सकता था। लेकिन उनके गीतों में भावनाओं की प्रचुरता थी।